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हमेशा चका-चक दिखने की क्या जरुरत है?

ये कुछ इत्तेफाक ही है कि ये पोस्ट भी मेरी मेट्रो यात्रा से प्रभावित है. खैर, मैंने बताया ही है मेट्रो में हमेशा ही मुझे कुछ नया लिखने की प्रेरणा मिल जाती है. तो हुआ यूँ कि पिछले दिनों मैं मेट्रो में ही कही जा रही थी. नवरात्र के दिन थे और दोपहर का समय. लेडीज कोच में काफी लड़कियाँ मुझे सूट और साड़ी में दिखी. अच्छा लगा कि अभी भी लोग समय और खास दिनों के हिसाब से पहनावे में बदलाव कर रहे है. पर मेरा ध्यान एक ऐसी लड़की पर था जो आराम से मेकअप कर रही थी. जी, टच अप कहते है जिसे. खुद को एक छोटे से शीशे में देखते हुए वो पूरा समय अपने आप को सवारती रही. वैसे तो मुझे कोई जरुरत ही नहीं लग रही थी टच अप की उसके चेहरे पर जो पहले से साफ़ और सुन्दर था. पर फिर भी ना जाने क्यों वो उस पहले से सुन्दर चेहरे पर और कुछ ठीक करने में लगी थी!! उसे देखते-देखते मेरा ध्यान अपने ऊपर गया. सामने मेट्रो के खिड़की में मेरा प्रतिबिम्ब दिख रहा था. चिपके बाल, हाथो में बस एक घड़ी, नाखूनों में थोड़ी छूटी हुई नेल पेंट, बिना मैचिंग की चप्पल और एक बेडौल काया. कही से भी मैं सुंदरता की लाइन में नहीं खड़ी दिखाई दी. मेरे मुँह पर अजीब स...

बच्चो के साथ मनाये हनुमान जयंती

मनोजवं   मारुततुल्यवेगं,  जितेन्द्रियं   बुद्धिमतां   वरिष्ठ  । वातात्मजं   वानरयूथमुख्यं,  श्रीरामदूतं   शरणं   प्रपद्ये  । जिनकी मन के समान गति और वायु के समान वेग है, जो परम जितेन्दिय और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, उन पवनपुत्र वानरों में प्रमुख श्रीरामदूत की मैं शरण लेता हूं!! आज हनुमान जयंती है. हनुमान जयंती को भगवान हनुमान के जन्म दिन के रूप में मनाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि आज के दिन शिव जी के ११वे अवतार के रूप में हनुमान जी का पृथ्वी पर आगमन हुआ था. और उनकाअवतरण भी एक खास मकसद से हुआ था. वो था भगवान विष्णु  के अवतार श्री राम की सेवा. हनुमान जी को श्री राम का सबसे बड़ा भक्त माना जाता है और उनकी अनन्य भक्ति के कारन ही हमेशा श्री राम के साथ हनुमान जी को भी पूजा जाता है. दोनों, भक्त और भगवान के इस रिश्ते को कई लेखो, कहानियो और ग्रंथो में  बड़े ही भाव पूर्वक दर्शाया गया है. हिन्दू धर्म की खासियत कहे कि उसमे ऐसी कई कहानियाँ है जो हमे किसी ना किसी भगवान के अवतरण के बारे में बतलाती है. और हर कहानी हमे कोई ना कोई ...

मन हारकर, मैदान नहीं जीते जाते..

पेड़ के ऊपर चढ़ा आदमी ऊंचा दिखाई देता है। जड़ में खड़ा आदमी नीचा दिखाई देता है। आदमी न ऊंचा होता है, न नीचा होता है, न बड़ा होता है, न छोटा होता है। आदमी सिर्फ आदमी होता है। पता नहीं, इस सीधे-सपाट सत्य को दुनिया क्यों नहीं जानती है? और अगर जानती है, तो मन से क्यों नहीं मानती इससे फर्क नहीं पड़ता कि आदमी कहां खड़ा है? पथ पर या रथ पर? तीर पर या प्राचीर पर? फर्क इससे पड़ता है कि जहां खड़ा है, या जहां उसे खड़ा होना पड़ा है, वहां उसका धरातल क्या है? हिमालय की चोटी पर पहुंच, एवरेस्ट-विजय की पताका फहरा, कोई विजेता यदि ईर्ष्या से दग्ध अपने साथी से विश्वासघात करे, तो उसका क्या अपराध इसलिए क्षम्य हो जाएगा कि वह एवरेस्ट की ऊंचाई पर हुआ था? नहीं, अपराध अपराध ही रहेगा, हिमालय की सारी धवलता उस कालिमा को नहीं ढ़क सकती। कपड़ों की दुधिया सफेदी जैसे मन की मलिनता को नहीं छिपा सकती। किसी संत कवि ने कहा है कि मनुष्य के ऊपर कोई नहीं होता, मुझे लगता है कि मनुष्य के ऊपर उसका मन होता है। छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता। इसीलिए तो भगवान कृष्ण को शस्त्रों से सज्ज, रथ पर च...

दिन तो महिलाओं का है पर बात पुरुषों की है

कल सम्पूर्ण विश्व के साथ भारत में भी "महिला दिवस" मनाया जाएगा. इस बार ये थोड़ा सा और खास इसलिए भी है क्युकी २०१८ में यह आयोजन अपने १०० वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है. आधुनिक विश्व के इतिहास में सर्वप्रथम १९०८ में १५००० महिलाओं ने न्यूयॉर्क में एक विशाल रैली निकाल कर अपने काम करने के घंटों को कम करने, बेहतर तनख्वाह और वोट डालने जैसे अधिकारों के लिए अपनी लड़ाई शुरू की थी. इस आंदोलन से तत्कालीन सभ्य समाज में महिलाओं की स्थिति की हकीकत पहली बार सामने आई. और ये लड़ाई तब से चल रही है. दुर्भाग्य की बात ये है कि १०० सालो में बहुत अंतर नहीं आया है समाज में महिलाओं की स्तिथि में. हर साल महिला दिवस पर महिलाओ की लैंगिक समानता की बात की जाती है. उसके सम्मान की बात की जाती है, उनके संवैधानिक अधिकारों की बात की जाती है और उनके प्रति बढ़ते अपराधों को रोकने की बात की जाती है. इसके बावजूद आज १०० सालों बाद भी असल में महिलाओं की स्तिथि अब भी वैसी ही है. आज भी विश्व के कई देशो में महिलाओं की हालत बेहद चिंताजनक है और दिन ब दिन महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध, शिक्षा का अभाव और व्यवहारिक असामनता अगले कई ...

बदलता जमाना देखना हो तो रेलवे स्टेशन जाइये..

दुनिया बड़ी तेज़ी से बदल रही है. नई नई तकनीकों ने हमारी जिंदगी को काफी हद तक आसान कर दिया है. अब ज्यादातर लोगो के पास फ़ोन है, घर में टीवी है,कपड़े धोने के लिए वाशिंग मशीन और कम से कम किचन में मसाला पीसने के लिए मिक्सी जरूर है. इस बदले ज़माने ने ही बच्चो को बड़ा करना भी आसान कर दिया है. अब हमारे पास काफी सारी ऐसी चीजें है जिनसे हम बिना फ़िक्र छोटे बच्चो के साथ बाहर जा सकते है, ट्रेन और हवाई जहाज में यात्रा कर सकते है और यह तक कि रोड ट्रिप पर भी जा सकते है. इस बदलते हुए ज़माने का एहसास मुझे तब ज्यादा हुआ जब मैं पिछले हफ्ते अपने पैतृक घर जाने के लिए ट्रेन पकड़ने रेलवे स्टेशन पहुंची. वैसे मेरा ट्रेनों से आना जाना पिछले १० सालों से जारी है पर काफी समय के बाद मैंने आस पास की चीजों पर गौर किया. आम तौर पर मैं दिल्ली से अपने पैतृक शहर जाने के लिए एक ही ट्रेन में रिजर्वेशन लेती हूँ. वो ट्रेन दिल्ली से वही तक जाती है और कम दूरी की ट्रेन होने की वजह से लेट भी बहुत कम ही होती है. पर इस बार जब मेरे पतिदेव रिजर्वेशन करवाने चले तो देखा कि ट्रेन कैंसिल थी जब हमे जाना था. मजबूरन हमे एक दूसरी ट्रेन में रिजर...

होली और होली के बदलते गाने..

होली का दिन हो और अपनी हिंदी फिल्मो के गाने न बजे ऐसा कैसे हो सकता है..  रंग बरसे भीगे चुनर वाली.. और आज ना छोड़ेंगे बस हमजोली.. जैसे गाने जब तक न बजे लगता ही नहीं कि होली आ गई है. इन गानों का बजना और लोगों का थिरकना जैसे किसी परंपरा की तरह हो गया है. होली के त्योहार का उत्साह बढ़ाने में बॉलीवुड ने हमारा खूब साथ दिया है. 1958 से लेकर आज तक फिल्मों में होली के गीत फिल्माएं जाते हैं और वे सुर्खियां भी बटोरते हैं. होली पर गानों का इतिहास काफी पुराना है. पहले के समय में लोग होली पर 'फाग' गाते थे. इसके साथ ही बड़े सारे गाने राधा-कृष्ण की होली को दर्शाने वाले होते थे. जैसे "आज ब्रिज में होली  रे रसिया..". 1981 में आई फिल्म सिलसिला का 'रंग बरसे भीगे चुनर वाली..' होली पर गाये और बजाये जाने वाले गानों में सबसे लोकप्रिय है. असल में ये गाना काफी पुराना है जिसकी जड़े अवध में गाये जाने वाले एक तरह के फाग में है. अभिताभ बच्चन जी खुद ही कई बार बताया कि ये गाना उन्होंने सबसे पहले अपनी पिता जी, हरिवंश राय बच्चन जी से सुना था. फिल्म में इस गाने का रूप थोड़ा बदला पर मिठ...

बच्चों की किताबो में दुनिया अलग होती है..

रिद्धि और सिद्धि दो बहने बस ३ और १ साल की थी जब उनकी माँ गुजर गई. रिद्धि के पापा ने बच्चों की छोटी उम्र के चलते सबके कहने पर दूसरी शादी कर ली. पर जैसा कि हमेशा होता है नई माँ दोनों बहनो के साथ अच्छा बर्ताव नहीं करती थी. सिद्धि तो छोटी थी इसलिए उसे कम समझ आता था नई माँ का पराया बर्ताव पर रिद्धि में इतनी समझ थी कि वो नई माँ की अजीब बोली और कड़वे जवाबो से दुखी हो जाए. रिद्धि के पापा अपनी बेटियों से प्यार तो करते थे पर नई माँ की तरफ भी उनका झुकाव हो गया था. इसलिए वो कभी कभी ही नई माँ के गलत बर्ताव पर उन्हें टोकते थे. रिद्धि अपनी छोटी बहन के साथ बस अपनी दुनिया सही करने में लगी रहती थी. रिद्धि के पापा को किताबो का बड़ा शौक था. उनके घर में दर्जनों किताबे थी अलग अलग हिंदी लेखकों की. रिद्धि के पापा किताबो के साथ ही अपनी पहली पत्नी के जाने का दुःख भुलाते रहते थे. जब भी खाली समय होता, उनके साथ में कोई ना कोई किताब होती. नई माँ को कभी कभी चिढ़ भी होती रिद्धि के पापा के किताबो को ज्यादा तवज्जो देने से. पर रिद्धि के पापा को उनकी बातो का कुछ फरक ना पड़ता, उन्होंने किताबो को ही दोस्त बना लिया था. और यह...

एक चुटकी तारीफ की कीमत तुम क्या जानो?

मेरी शादीशुदा जिंदगी अच्छी चल रही है. मुझे अपने मन से काम करने की आजादी है. पतिदेव भी सहयोग करते है बेटे की देखभाल में. हर तरह से एक सुलझी जिंदगी है मेरी जो हँसी ख़ुशी बीत रही है परिवार के साथ. पर वो होता है ना हमे कुछ ना कुछ मिल ही जाता है जिसे हम बदलना या और अच्छा करना चाहते है. अभी कुछ दिनों पहले मैं और मेरे पतिदेव बात कर रहे थे. तो मैंने उनसे वो कहा जो मैं बड़े दिनों से सोच रही थी. ये हमारे रिश्ते से ही जुड़ा था. मैंने कहा "आपने आज तक कभी मेरी तारीफ नहीं की..हमारी शादी को ६ साल हो गए है पर मैंने कभी नहीं सुना आपके मुँह से कि तुम अच्छी लग रही हो.." पतिदेव ने हँस कर कहा "ये बात तो सही कही तुमने. तारीफ तो मैंने नहीं की. पता नहीं क्यों कर नहीं पता तारीफ? कई बार मन भी हुआ पर शब्द नहीं निकल पाए.." बस यही एक चीज मुझे अपने रिश्ते में थोड़ी कम दिखती है. एक दूसरे की तारीफ की कमी. मैं एक स्त्री हूँ और स्त्रियों का मनोविज्ञान तारीफ को बड़ा महत्व देता है. तारीफ हम महिलाओं के लिए मशीन में तेल सा काम करती है. जैसे तेल डालने से पुर्जे ज्यादा अच्छे से लम्बे समय तक काम करते है....

लहसुन तुम सब्ज़ी हो कि मसाला..?

क्या जमाना आ गया है.अभी कुछ दिनों पहले पता चला कि लहसुन पर मुकदमा ठोक दिया गया है. जरा सोच कर देखिये ये सुंदर सा लहसुन क्या गुनाह कर गया कि उस पर मुकदमा चला दिया. जज साहब, लहसुन से "लहसुन कठघरे में आओ." लहसुन "जी माई-बाप.पर हम किये  क्या है?" जज साहब " ये तो सही से मुझे भी नहीं पता अभी पर कुछ लोगो को तुमसे परेशानी है." लहसुन "अच्छा.पर हम तो कुछ किये ही नहीं.सदियों से ऐसे ही है. कुछ भी बदले नहीं है रंग ढंग में. " जज साहब "वो तो ठीक है पर अब मुकदमा तो चलेगा ही.फिर देखते है तुमने क्या किया है." हुआ यूं कि एक विवाद को लेकर जोधपुर के आलू-प्याज़ और लहसुन विक्रेता संघ ने राजस्थान हाइकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है. याचिका में उहोंने पूछा है कि आखिर लहसुन को अनाज मंडी में क्यों बेचें? दरअसल, राजस्थान सरकार के 2016 के नए कानून के मुताबिक लहसुन को अनाज मंडी में बेचा जाना चाहिए. लेकिन 2016 से पहले तक इसे सब्ज़ी मंडी में बेचा जाता था. सब्ज़ी मंडी में बेचने पर बिचौलिए छह प्रतिशत कमीशन देते हैं लेकिन अनाज मंडी में बिचौलिए केवल दो ...

शादी करवा दो इसकी, अपने आप सुधर जाएगा..

शादियाँ हमारे समाज का एक हिस्सा हैं और साल दर साल लड़के लड़कियाँ शादी के बंधन में बंधते ही रहते हैं. शादियों से जुड़ी एक अजीब सी आदत या यूं कहूँ परंपरा मुझे बड़ा अचरज में डाल देती हैं. जो लड़का आवारा, नाकारा या नालायक हो उसकी शादी करवा दो. लड़के के घरवालों को ये लगता हैं कि शादी के बाद लड़का सुधर जाएगा. मुझे आज तक समझ नहीं आता कि ऐसा कैसे होता होगा? जो लड़का खुद से अपने जीवन के बारे में सोच ना सके वो किसी दूसरे घर से आई लड़की के बारे में कैसे सोच पाएगा..? पर चल रहा हैं ये सिस्टम जमानो से.. कल धर्मेंद्र जी का जन्मदिन था. मैंने उनके ऊपर लिखे एक लेख में पढ़ा कि धर्मेंद्र जी के पिता जी ने उनकी शादी फिल्मों का भूत उनके सर से उतारने के लिए कर दी थी. ये कब से चला आ रहा है कि लड़के को सुधारने के लिए उसकी शादी कर दो..? मुझे नहीं लगता कोई सुधरता है क्योंकि धर्मेंद्र जी ने खुद कबूला कि वो सुधरे नहीं शादी के बाद भी.. वो कहते हैं  " एक बार मुझे भी लगा कि अब स्थिर होना चाहिए. घर-गृहस्थी है, जिम्मेदारियां हैं. जुआ खेल पाने का वक्त गया. बहुतेरी कोशिश की कि कहीं जम जाऊं. पर तभी ‘फिल्मफेयर-यूनाइटेड प्रो...

सजना-सवरना जरूरी है हमारे लिए..

अभी हाल ही में मैं अपने परिवार की दो शादियों में शामिल होकर आई हूँ . मज़ा आया सच में. सारा परिवार, दूर वाले भी रिश्तेदार और अच्छा खाना और क्या चाहिए मौसम और शादी के मज़े लेने के लिए. एक हफ्ते में मैंने कई सारी रस्मे और रिवाज़ देखे और उनमे शामिल भी हुई. हर रस्म के पहले घर की सारी महिलाएं और लड़कियाँ सज धज कर तैयार हो जाती थी और फिर रस्मो के बीच-बीच में फोटो और सेल्फी सेशन होते रहते थे. जब से ये सेल्फी लेने का चलन शुरू हुआ है कम लोग ही चूकते है अपने सुन्दर और बेदाग सेल्फी लेने से. इन सब रस्मो के चलते मैं भी एक हफ्ते में कम से कम ७-८ बार अलग अलग साड़ियां पहन कर तैयार हुई. थोड़ा मेकअप तो बनता ही है साड़ी के साथ तो वो भी किआ. मैचिंग नकली ज्युलरी और एक अच्छी सी स्माइल चेहरे पर. सुन्दर दिखने के लिए इतना तो किया ही जा सकता है. इस सज़ने-सवरने के बीच मैंने अपने परिवार की और भी महिलाओ और छोटी लड़कियों की तरफ गौर किआ. सब की सब सुन्दर दिखना चाहती थी. चाहे वो मेरी ५० साल की सासू माँ हो या ४ साल की भतीजी, सबने भरपूर मेहनत की शादी की धूम धाम के बीच सुन्दर दिखने की. घर की बड़ी लड़कियाँ जिनके पास टा...

शादी करना फायदेमंद है या नुकसानदायक?

आजकल शादियों का सीजन चल रहा है. जहाँ देखो किसी ना किसी की शादी हो रही है. मेरे अपने ही परिवार में दो बेटियों की शादियाँ है इसी हफ्ते. ऑफिस में भी शादियों के निमंत्रण मिल रहे है. पर ऐसे ही मेरे दिमाग में ख्याल आया कि जब शादी जी का जंजाल है और हर शादीशुदा आदमी (ज्यादातर) और औरत यही कहती है कि शादी का लडडू ना खाया जा पा रहा है और ना निगला फिर अगला हर कोई शादी के लिए क्यों तैयार हो जाता है? ख़ुशी ख़ुशी शादी करने वाले बाद में एक दूसरे की कमियां निकालने में ज्यादा समय लगाते है. और बीच-बीच में वो अपना संजीदा डायलॉग भी बोल देते है एक दूसरे को "तुमसे शादी करके जिंदगी की सबसे बड़ी गलती की है मैंने.." अब लोग शादी क्यों करते है इसके पीछे कई कारण हो सकते है. कुछ प्यार में अंधे होकर शादी करते है. कुछ समाज और घर वालो के दबाव में कर डालते है. कुछ ऐसे भी है जो दहेज़ के लालच में शादी का लडडू निगल लेते है और बाकी बचे लोगो को सुधारने के लिए उनके घर वाले किसी और के मत्थे मढ़ देते है मतलब शादी करा देते है कही. आम तौर पर लोग समाज और घर वालो के दबाव में शादी करते है और फिर जब भी शादी के बाद झगड़ा होत...

सिकुड़ते बचपन आज के बच्चो के..

चौदह नवंबर बाल दिवस के रूप में मनाने का औचित्य यह है कि पं. जवाहरलाल नेहरू मानते थे कि बच्चों से ही देश का भविष्य बनता है. उनकी यह अवधारणा सौ फीसदी सत्य है, क्योंकि आज जन्मा शिशु भविष्य में राजनीतिज्ञ, वैज्ञानिक, लेखक, शिक्षक, चिकित्सक, इंजीनियर या मजदूर कुछ भी बने आखिर राष्ट्र निर्माण का भवन इन्हीं की नींव पर खड़ा होता है. पर मुझे लगता है कि आज के समय में हम बच्चो के साथ अच्छा नहीं कर रहे. उन्हें भविष्य के लिए तैयार करते करते उनका "आज" उनसे छीन रहे हैं. दुनिया में धीरे-धीरे बच्चों का अकाल पड़ता जा रहा है. अकाल, बचपने का, अकाल भोली और सीधी साधी बातो का. पहले बचपन चौदह-पंद्रह साल तक रहता था. और मैं ज्यादा पहले की नहीं , बल्कि अपने ही बचपन के अनुभव से ऐसा बोल सकती हूँ. इस उम्र तक मेरे बचपन में ज्यादातर बच्चे अच्छा खाने और घूमने के आगे की बातें सोचते ही नहीं थे. पर आज के गतिशील समाज में बचपन सिमटता सा जा रहा है. हर जगह बच्चों में परिपक्वता सालने लगी है. ( गाय मीन्स काऊ (cow) - नई पीढ़ी की सीख ) कल TV पर एक शो देख रही थी. एक ७ साल की बच्ची ने कहा कि वो बड़े होकर ऑस्ट्रोनोट ब...

गाय मीन्स काऊ (cow) - नई पीढ़ी की सीख

कभी रस्ते में अगर गाय दिख जाये और कोई ऐसा भी हो जो उसे आज भी गाय के ही नाम से पुकारता हो तो कुछ बच्चे शायद से पूछ बैठे कि  "गाय क्या होता है?" खुद को खुसनसीब समझिये, मुस्कुराइए और बड़े प्यार से समझाइये की, "गाय मीन्स काऊ". अब यही ज़माना है, हम कुछ आखरी लोग बचे है जो अभी भी हिंदी के शब्दों को समझते है और ये काबिलियत रखते है की अपने आने वाली पीढ़ी को उसका अंग्रेजी में मतलब समझा सके. यूँ तो हाल ही में ऑक्सफ़ोर्ड इंग्लिश डिक्सेनरी में सत्तर हिंदुस्तानी शब्द शामिल किये गए है . हम एक ऐसे समय की ओर निकल आये है जब थोड़े बहुत ही हिंदी जानने वाले बचे है जो ये जानते हुए भी की उस बात को अंग्रेजी में कैसे कहेंगे सबके सामने हिंदी बोलने में संकोच नहीं करते. बाकी तो ज़माना ही अंग्रेजी मेडीयम का है. हमारे देश में जहा थोड़ी थोड़ी दूर पर ही भाषा बदल जाती है और हिंदी भी कई अलग अलग रूपों में बोली जाती है. पर कमाल की बात है कि सब के सब अंग्रेजी पर एक हो जाते है. क्यूंकि अंग्रेजी अब वो माध्यम है जिससे और किसी क्षेत्रीय भाषा को बोलने वालो की भावनाये आहत नहीं होती. ये किसी दूसरे देश की ...

मम्मा, मैं आपसे शादी करुँगा..

कल शाम मैं अपने ३ साल के बेटे विभू के साथ खेल रही थी. दिवाली के बाद जले हुए दिए इकट्ठा करके वो अक्सर ही खेलता है तो कल मैं भी शामिल हो गई उसके खेल में. मैंने दियो से एक के ऊपर एक रख कर ऊंचा सा एक आकर बनाया और और अपने बेटे से कहा "देखो..मैंने टेम्पल (मंदिर) बना दिया.." मेरा बेटा खुश हुआ उसे देख कर फिर कुछ सोच कर उसने सबसे सामने वाला दिया अपने जगह से हटा दिया और अपने पीछे रख लिया. मैं समझने की कोशिश ही कर रही थी कि ऐसा क्यों किआ उसने, उसने उत्सुकता से बोला "मम्मा.. अब मैं टेम्पल के अंदर आ गया.. अब पंडित जी मेरी शादी करवा देंगे.." मैं तो सन्न हो गई एकदम. ३ साल का बालक और शादी की बातें. फिर मैंने उससे पूछा " पंडित जी शादी करवाते है क्या?" मेरे बेटे ने सर हिलाते हुए जवाब दिया "हाँ .. पंडित जी शादी करवाते है और फिर वापस अपने घर चले जाते है.." मुझे हसीं आ गई उसकी बात पर. फिर मैंने सोचा इससे पता करती हूँ कि शादी के बारे में इसे किसने बताया. क्यूकि आज तक मैंने उससे शादी के बारे में कोई बात नहीं की. और मेरा बेटा सीधे पंडित जी तक पहुंच गया तो मैं अधीर ह...